कथा के संदर्भ में नारी विमर्श
कथा के संदर्भ में नारी विमर्श रामनाथ शिवेंद्र नारी अस्मिता के सवालों पर वौद्धिकों की चिताएं पसीना बहाने वाली कम हसाने वाली अधिक साबित हो रही हैं। नारी मुद्दों पर पुरूष मन की आक्रामकता कब और कैसे पगलाई हरकतें करने लगती हैं इसका आभास उसे तो होता ही नहीं जो प्रतिक्रिया कर रहा होता है। आभास होता तो गंगा में से नहा कर निकली नारियों के पवित्र रूपों को सिरजने वाले पगलाये वौद्धिक, पुरूष मन की खूनी आक्रामता वाली सोच व चेतना के मकड़जाल में नहीं उलझते। वे उन्हें नहीं गरियाते जो नारियों को बराबरी के स्तर पर सम्मानित करते हुए लोकसंघर्ष की लड़ाकू भूमिका में देखना चाहते हैं। जरा ठहर कर सोचिए, हालांकि नारीविमर्श में शामिल होने वाले सभी वौद्धिक एक ही तरह की सोच व संचेतना के उत्पाद नहीं हैं, कुछ तो ऐसे हैं ही जो नारियों के बारे में बुर्के में ढकी बातें नहीं कर रहे हैं, उनकी बातें नारीविमर्श के बारे में नर और नारी के मित्रतापूर्ण सहसंबधों की ओर प्रस्थान करती हुई हैं। दिक्कत हमारी सामाजिक संरचना से गढ़ी हुई मर्दवादी सोच में है। सवाल पुरुष सोच का है, दिक्कत ऐसे पितृ सत्ता वाले चि...